फिराक गोरखपुरी की एक पंक्ति है- ‘मुद्दतों सोचना और मुख्तसर बोलना।’
चुप-चुप रहना
| दर्द का कहना चीख उठो,दिल का तकाजा वजअ( स्वाभिमान) निभाओ सब कुछ सहना चुप-चुप रहना काम है इज्जतदारों का -इब्ने-इंशा |
| खरीदते तो खरीदार खुद ही बिक जाते तपे हुए खरे सोने का भाव ऐसा था -कृष्ण बिहारी नूर |
| तुम मसर्रत (खुशी)का कहो या इसे गम का रिश्ता कहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता कैफ़ी आजमी |
| फजां में आयतें महन्कीहुई है कहीं बच्चे तिलावत कर रहे हैं -बशीर बद्र |
| सुना है बोले तो बातों से फूल झरते हैं ये बात है तो चलो बात करके देखते हैं-अहमद फराज |
| चंद लम्हों को ही बनाती है मुसव्विर (चित्रकार)आँखें जिन्दगी रोज तो तसवीर बनाने से रही-निदा फाजली |
| दुनियाँ की सारी अच्छी तस्वीरों में इक चेहरा जाना पहचाना होता है-नोमान शौक |
| मुद्दतें गुज़रीं तेरी याद भी आई न हमेंऔर हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं-फ़िराक़ |
| तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो तुम को देखें कि तुम से बात करें-फ़िराक़ |
| घर से मस्जिद है बहुत दूर ,चलो यूं कर लें किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए -निदा फाजली |
| गुजरो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो जिसमें खिले हैं फूल ओ डाली हरी रहे-निदा फाजली |
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| तमाम घर की फजा को बदलता रहता है वो इक खिलौना जो आँगन में चलता रहता है-अजहर इनायती |
| मेरी आँखों में हँसे आ के गुले-तर (सुन्दर पुष्प)कोई तू जो पानी की तरह खुद पे उछाले मुझकों-आचार्य सारथी रूमी |
| काश!!रूमी मैं देखता जाऊं लम्हा-लम्हा निखार फूलों का |
| इन दुआ माँगते बच्चों को दुआ दी मैंने इनके सुख पे न दुखों की कोई दीवार गिरे -आचार्य सारथी रूमी |
| अक्से-खुशबू हूँ,बिखरने से न रोके कोई और बिखर जाऊं तो मुझको न समेटे कोई -परवीन शाकिर |
| कोई आहट,कोई आवाज,कोई चाप नहीं दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान हैं,आये कोई -परवीन शाकिर |

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